संस्कृति और समुदाय

कोशी प्रदेश में लिंबू और मैथिली का सरकारी उपयोग — भाषाओं के बने रहने व सेवाओं पर असर

कोशी प्रदेश ने लिंबू और मैथिली को सरकारी कामकाज में अपनाने का बिल दायर किया है — इसका प्रभाव भाषा संरक्षण, सार्वजनिक सेवा और स्थानीय प्रशासन पर क्या होगा।

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परिचय — क्या हुआ और क्यों यह मायने रखता है

कोशी प्रदेश सरकार ने "सरकारी कामकाजका भाषाका व्यवस्थाका बारेमा" सम्बन्धी अध्यादेश/बिल पंजीकृत कर प्रदेश स्तर पर लिंबू और मैथिली भाषाओं को सरकारी कामकाज में अपनाने की दिशा में कदम उठाया है। यह निर्णय भाषा अधिकारों और बहुभाषी प्रशासन की बहस को नया रूप दे रहा है, क्योंकि इन भाषाओं को बोलने वाले समुदायों की संख्या प्रदेश में महत्वपूर्ण है।

सरकार की प्रस्तुति के अनुसार यह व्यवस्था दस्तावेजों के अनुवाद, नोटिस और स्थानीय सेवाओं में इन भाषाओं के उपयोग की सुविधा देगी — पर ऐसा लागू होने पर क्या बदलाव तुरंत दिखेंगे और किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, यह जानना जरूरी है।

नीति का कानूनी और प्रशासनिक ढाँचा

बिल को संविधान २०७२ (2015) की धारा 7(2) के आधार पर पंजीकृत किया गया है और इसका उद्देश्य भाषा-अधिकार की गारंटी के साथ स्थानीय लोगों के प्रशासनिक पहुंच को आसान बनाना बताया गया है। प्रस्ताव में शामिल प्रमुख प्रावधानों में दस्तावेजों का अनुवाद, आरम्भिक सेवाओं में अनुवादक नियुक्त करना, प्रदेश राजपत्र व सूचनाओं का बहुभाषी प्रकाशन और कार्यालयों में संबंधित भाषाओं में नाम-पट्टिकाएँ शामिल हैं।

सरकारी स्रोतों और समाचार कवरेज के अनुसार प्रदेश सरकार ने लागू तिथि के रूप में एक प्रतीकात्मक तिथि चुनी है — जो कुछ रिपोर्टों में 11 नवम्बर, 2025 बताई जा रही है — हालांकि अंतिम लागू प्रक्रिया और स्थानीय स्तर पर समय-सीमा विभाग एवं बिनियोजन पर निर्भर करेगी।

भाषिक आँकड़े और सिफारिशें

  • 2021 जनगणना व भाषा आयोग की रिपोर्टों के अनुसार कोशी क्षेत्र में मैथिली व लिंबू दोनों की बोलने वालों की संख्या महत्वपूर्ण है; यही कारण है कि भाषा आयोग ने इन्हें लागू करने की सिफारिश की थी।
  • बिल में अन्य स्थानीय भाषाओं के संरक्षण की व्यवस्था का भी जिक्र है, पर वर्तमान प्रस्ताव शुरू में केवल लिंबू और मैथिली को प्राथमिक आधिकारिक कामकाजी भाषाएँ रखने पर केन्द्रित दिखता है।

समुदाय, विवाद और जमीन पर प्रभाव

नीति का स्वागत कुछ समुदायों ने किया है, जबकि अन्य समुदायों — विशेषकर राय समुदाय के प्रतिनिधियों — ने चिंता जताई है कि बनावट के कारण उनकी बोलियाँ (जैसे बंतावा, चामलिंग) बाहर रह जाएँगी। इन विभिन्न आवाज़ों ने सुझाव दिया है कि भाषाओं का चयन सांस्कृतिक रचनात्मकता के साथ-साथ जनसंख्या-आधारित न्यायसंगत होना चाहिए। इस पर सार्वजनिक बहस और विधायी संशोधनों की माँग उठ रही है।

व्यावहारिक प्रभावों में शामिल होंगे: स्थानीय कार्यालयों में अनुवादकों और बहुभाषी स्टाफ की नियुक्ति; पाठ्यक्रम व परीक्षा सामग्रियों का अनुवाद; और सरकारी वेबसाइट, सूचना पट्टिकाओं व सूचनाओं का बहुभाषी प्रकाशन। छोटे स्थानीय निकायों में भी पहले से ही लिंबू को कार्यभाषा बनाने के उदाहरण मिल रहे हैं, जो नीति के जमीन पर उतरने की संभाव्यता को बढ़ाते हैं।

Biratnagar Koshi Province government office sign multilingual Nepal
Photo: Nataliya Vaitkevich — Pexels
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